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आज देहरादून में अंतर्राष्ट्रीय किसान यूनियन के अंतर्राष्ट्रीय संयोजक एवं प्रदेश प्रभारी उत्तराखंड रवि पंवार जी से गन्ना की स्थिति एवं चीनी के बढ़ते दामों को लेकर चर्चा हुई, जिस में उन्होंने बताया कि
सरकार के आंकड़े के मुताबिक 20 जुलाई को चीनी का औसत रिटेल भाव ₹48.18 किलो था, जो 20 अगस्त तक ₹55.70 किलो हो गया। पिछले एक महीने में ही 17% की तेजी आई है। यूपी में तो 19 मिलों ने लगातार रेट बढ़ाए और अलीगढ़ में बुधवार को चीनी 61 रुपये किलो बिकी थी – पिछले 80 साल का रिकॉर्ड बताया जा रहा है।
बताया कि मिलें मालामाल कैसे हो रही हैं?
1. कम गन्ना, ज्यादा दाम: इस बार मिलों को उम्मीद से कम गन्ना मिला। ननोता मिल के निदेशक के मुताबिक इस बार 57-58 लाख क्विंटल ही आया, जबकि पिछले साल ज्यादा था। सप्लाई कम, तो एक्स-मिल प्राइस हर महीने 50-100 रुपये बढ़ता गया। 2. इथेनॉल का खेल: सरकार के इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम में मिलों को 40 लाख टन चीनी डायवर्ट करनी थी। जब चीनी का दाम 39-41 रुपये से बढ़कर 55-61 हो गया, तो मिलों के लिए सीधे चीनी बेचना, इथेनॉल बनाने से ज्यादा फायदेमंद हो गया। रिपोर्ट कहती है इससे बलरामपुर चीनी, द्वारिकेश, रेणुका, डालमिया जैसी कंपनियों के मार्जिन सुधरेंगे।
पर किसान फिर भी पीछे रह जाता है क्योंकि….
1. FRP vs SAP का जाल: सरकार ने 2026-27 सीजन के लिए FRP ₹338.3 प्रति क्विंटल तय किया है। पर मिलें इसी पर अटकी रहती हैं। जब बाजार में चीनी 40% दो महीने में बढ़ जाए, तो उस बढ़ोतरी का हिस्सा किसान तक नहीं पहुंचता।
2. भुगतान में देरी: चीनी महंगी होते ही मिलें स्टॉक रोक कर और मुनाफा कमाती हैं, जबकि किसान का पिछला बकाया महीनों तक लटका रहता है। गन्ना नकदी फसल है, पर पैसा नकद नहीं आता।
3. लागत किसान की, मुनाफा मिल का: खाद, डीजल, मजदूरी सब किसान की जेब से, और रिकवरी रेट 9.5% से कम होने पर भी कटौती न करने जैसे फैसलेकागज पर ही रह जाते हैं।
बढ़ती कीमत थामने के लिए सरकार द्वारा 10 लाख टन ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दे दी हैऔर कह रही है कि एथेनॉल की वजह से दाम नहीं बढ़े।
सीधी बात ये है – जब तक चीनी के बाजार भाव को गन्ने के भाव से नहीं जोड़ा जाएगा और भुगतान को 14 दिन के अंदर सख्ती से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक मिलों के गोदाम भरते रहेंगे और किसान पर्ची लेकर चक्कर काटता रहेगा।
हम सरकार को आगाह करना चाहते है कि अब देश के अन्नदाता का शोषण बंद करे ओर किसानों उनके हिस्से का मुनाफा बोनस के रूप में देने की प्रक्रिया चीनी मिलो द्वार शुरू करवाए।
नहीं तो एक बार फिर यह बड़े किसान आंदोलन की शुरुआत होगी।









