लाइव देवभूमि भारत संवाददाता-दिल्ली
जयंत चौधरी, टिकैत परिवार, जम्मू-कश्मीर के डिप्टी सीएम सुरिंदर चौधरी और गौरव टिकैत का एक साथ दिखाई देना बना चर्चा का विषय
नई दिल्ली/पश्चिमी उत्तर प्रदेश। किसान राजनीति और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत पर नजर रखने वालों के लिए कुछ मुलाकातें सामान्य शिष्टाचार से कहीं ज्यादा मायने रखने लगती हैं। केंद्रीय मंत्री एवं राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी, किसान नेता राकेश टिकैत/टिकैत परिवार, जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी और गौरव टिकैत जैसे चेहरों का एक साथ आना इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
हालांकि इस मुलाकात से किसी नए राजनीतिक गठबंधन या औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं होती, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसके कई राजनीतिक और किसान-संगठनात्मक अर्थ निकाले जा रहे हैं।
जयंत और टिकैत—पुराना रिश्ता, लेकिन रास्ते हमेशा एक नहीं
चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत का केंद्र किसान रहा है और राष्ट्रीय लोकदल की राजनीति का आधार भी लंबे समय तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान तथा ग्रामीण समाज रहा है। दूसरी तरफ टिकैत परिवार भारतीय किसान यूनियन के माध्यम से किसान आंदोलनों का एक प्रभावशाली केंद्र रहा है।
दोनों परिवारों के बीच संवाद कोई नई बात नहीं है। किसान आंदोलन के दौर में भी जयंत चौधरी और टिकैत परिवार कई अवसरों पर करीब दिखाई दिए थे। दिसंबर 2021 में जयंत चौधरी और राकेश टिकैत ने किसान घाट पर चौधरी चरण सिंह की जयंती के कार्यक्रम में साथ हिस्सा लिया था।
लेकिन समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। जयंत चौधरी सत्ता पक्ष के साथ आए और केंद्रीय मंत्री बने, जबकि राकेश टिकैत किसानों के मुद्दों पर सरकार की नीतियों की आलोचना करते रहे।
दिलचस्प बात यह है कि 1 सितंबर 2026 को मेरठ की एक किसान महापंचायत में जयंत चौधरी को लेकर पूछे गए सवाल पर राकेश टिकैत ने कहा था कि जब जयंत को कृषि मंत्रालय मिलेगा तब उनसे सवाल पूछा जाएगा।
ऐसे माहौल में दोनों पक्षों के बीच संवाद या मुलाकात स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा को जन्म देती है।
जम्मू-कश्मीर के डिप्टी सीएम की मौजूदगी क्यों महत्वपूर्ण?
इस तस्वीर का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी हैं।
सुरिंदर चौधरी हाल के दिनों में जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिए जाने के मुद्दे को भी सार्वजनिक रूप से उठा रहे हैं। 5 सितंबर को उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों से किए गए राज्य का दर्जा बहाल करने के वादे को पूरा करेगी।
टिकैत परिवार के साथ उनका संपर्क भी नया नहीं है। अगस्त 2025 में सुरिंदर चौधरी राकेश टिकैत के साथ सिसौली पहुंचे थे और किसान संबंधी कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
इसलिए इस मेल-मिलाप को केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित करके देखना भी उचित नहीं होगा। यह किसान नेताओं और अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के बीच संवाद का व्यापक मंच बनने की संभावना की ओर संकेत कर सकता है।
क्या फिर केंद्र में आ रही है ‘किसान राजनीति’?
देश की राजनीति में किसान लंबे समय से बड़ा सामाजिक और चुनावी वर्ग रहा है। एमएसपी की कानूनी गारंटी, फसलों का लाभकारी मूल्य, गन्ना मूल्य और बकाया भुगतान, कृषि लागत, बिजली, खाद-बीज, फसल बीमा, कर्ज तथा भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दे आज भी किसान संगठनों के एजेंडे में हैं।
ऐसे में यदि सत्ता में भागीदारी रखने वाले किसान पृष्ठभूमि के राजनीतिक नेता और आंदोलन से जुड़े किसान संगठन संवाद की मेज पर आते हैं, तो इसका महत्व बढ़ जाता है।
इस मुलाकात से तीन संभावनाओं पर चर्चा हो सकती है—
पहली, किसान संगठनों और सरकार के बीच संवाद का कोई नया रास्ता तैयार हो।
दूसरी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान और जाट राजनीति के पुराने सामाजिक समीकरणों को फिर से साधने का प्रयास हो।
और तीसरी, यह पूरी तरह व्यक्तिगत तथा सामाजिक मुलाकात हो, जिसे मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के कारण जरूरत से ज्यादा राजनीतिक अर्थ दिए जा रहे हों।
फिलहाल तीसरी संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि किसी औपचारिक राजनीतिक समझौते की पुष्टि सामने नहीं आई है।
गौरव टिकैत की मौजूदगी भी देती है संदेश
गौरव टिकैत की मौजूदगी को भी किसान राजनीति की अगली पीढ़ी के संदर्भ में देखा जा सकता है। टिकैत परिवार का प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा है। चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत से निकला किसान आंदोलन आज नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है।
उधर जयंत चौधरी स्वयं चौधरी चरण सिंह और चौधरी अजित सिंह की राजनीतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसलिए एक तरफ चरण सिंह की राजनीतिक किसान विरासत और दूसरी तरफ महेंद्र सिंह टिकैत की आंदोलनकारी किसान विरासत—इन दोनों धाराओं के प्रतिनिधियों का संवाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हमेशा राजनीतिक महत्व रखता है।
क्या पश्चिमी यूपी में बदल सकता है समीकरण?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान, जाट, गुर्जर, मुस्लिम, दलित और अन्य ग्रामीण समुदायों के सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण रहे हैं। किसान आंदोलन ने एक समय अलग-अलग समुदायों को किसान के साझा मुद्दे पर साथ खड़ा करने की कोशिश की थी।
जयंत चौधरी की राजनीतिक ताकत का बड़ा आधार भी यही क्षेत्र रहा है, जबकि टिकैत परिवार की संगठनात्मक जड़ें मुजफ्फरनगर-सिसौली से निकलकर पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों तक जाती हैं।
इसलिए दोनों के बीच बढ़ता संवाद भविष्य में किसान मुद्दों पर किसी साझा पहल का रूप लेता है तो इसका असर केवल किसान आंदोलनों पर नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दिशा पर भी पड़ सकता है।
मुलाकात को लेकर जल्दबाजी से निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं
राजनीति में तस्वीरें कई बार संदेश देती हैं, लेकिन हर तस्वीर गठबंधन की घोषणा नहीं होती।
अभी तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि जयंत चौधरी और टिकैत परिवार के बीच कोई नया राजनीतिक गठबंधन तय हो गया है। इसी तरह सुरिंदर चौधरी की मौजूदगी को किसी राष्ट्रीय राजनीतिक मोर्चे के गठन से जोड़ने के लिए भी ठोस प्रमाण चाहिए।
लेकिन इतना जरूर है कि किसान राजनीति से जुड़े प्रभावशाली चेहरों के बीच संवाद बना रहना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
आज किसान की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि उसकी समस्याएं केवल चुनावी भाषणों तक सीमित न रहें, बल्कि नीति निर्माण की मेज तक पहुंचें।
असली सवाल यही है—
क्या यह सिर्फ एक शिष्टाचार मुलाकात है, या किसान राजनीति में भविष्य के किसी बड़े संवाद की शुरुआत?
इसका जवाब आने वाला समय देगा। लेकिन जयंत चौधरी, टिकैत परिवार, सुरिंदर चौधरी और गौरव टिकैत जैसे चेहरों का एक फ्रेम में आना राजनीतिक और किसान हलकों में चर्चा पैदा करने के लिए पर्याप्त है।
क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है—जब किसान की राजनीति और किसान का आंदोलन एक-दूसरे से संवाद करते हैं, तो उसकी गूंज सिर्फ सिसौली और बागपत तक सीमित नहीं रहती, दिल्ली तक सुनाई देती है।










